पानी भी मानवाधिकार है, सबसे कमजोर तक पहुँचे न्याय

स्वच्छ और सुरक्षित पानी केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि जीवन और गरिमा से जुड़ा बुनियादी अधिकार है। जब किसी गाँव या बस्ती में पानी दूषित मिलता है या समय पर नहीं मिलता, तो सबसे पहले बीमार वही पड़ते हैं जिनके पास इलाज का साधन सबसे कम होता है। इसलिए पानी के अधिकार को केवल नल या पाइपलाइन तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता, बल्कि उसकी गुणवत्ता, नियमितता और सबकी पहुँच भी उसी अधिकार का हिस्सा है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के 33वें स्थापना दिवस पर आयोजित सम्मेलन में पानी को मानव गरिमा से जोड़कर चर्चा की गई। इस अवसर पर यह बात सामने आई कि संविधान में दिए गए जीवन, समानता और गरिमा के वादे तभी पूरे होंगे जब वे दूर-दराज के जिलों और कमजोर परिवारों तक सच में पहुँचें।

पानी के मामले में शिकायत अक्सर देर से सामने आती है, कई बार दूषित पानी से बीमारी फैलने के बाद ही प्रशासन हरकत में आता है, जबकि रोकथाम पहले होनी चाहिए। मानवाधिकार की दृष्टि से यह एक व्यवस्था की कमी है, जिसे केवल मुआवजे से नहीं, बल्कि पानी की जाँच, जानकारी के प्रसार और जिम्मेदारी तय करने से सुधारा जा सकता है।

आगे का रास्ता साफ है। हर बस्ती में पानी की गुणवत्ता की नियमित जाँच सार्वजनिक हो, शिकायत का सरल माध्यम उपलब्ध हो और महिलाओं, बच्चों तथा बुजुर्गों की जरूरतों को प्राथमिकता मिले। जब पानी सबको सुरक्षित और सम्मान के साथ मिलेगा, तभी मानवाधिकार का वादा जमीन पर पूरा माना जाएगा।