स्वच्छ हवा हर बच्चे का अधिकार, प्रदूषण पर जवाबदेही जरूरी

सर्दी की शुरुआत के साथ ही कई शहरों में हवा की गुणवत्ता खराब होने लगती है और इसका सबसे बुरा असर बच्चों तथा बुजुर्गों पर पड़ता है। बच्चे की साँस लेने की गति तेज होती है और उसके फेफड़े अभी विकसित हो रहे होते हैं, इसलिए धूल, धुआँ और जहरीले कण उसके स्वास्थ्य को अधिक नुकसान पहुँचाते हैं। स्वच्छ हवा को इसी कारण केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार का प्रश्न माना जाना चाहिए।

स्कूलों की छुट्टी अस्थायी उपाय है, स्थायी हल नहीं। निर्माण धूल, कचरा जलाना और वाहनों का धुआँ मिलकर हवा खराब करते हैं। जब तक इन स्रोतों पर अलग-अलग और लगातार कार्रवाई नहीं होगी, तब तक हर साल यही स्थिति दोहराई जाएगी।

मानवाधिकार की दृष्टि से यह भी जरूरी है कि हवा की गुणवत्ता की जानकारी आम लोगों तक सरल भाषा में पहुँचे। जब लोग जानेंगे कि उनके इलाके की हवा कितनी खराब है, तभी वे मास्क, घर के अंदर की सावधानी और बाहर निकलने के समय के बारे में सही फैसला ले सकेंगे। जानकारी छिपाना या देर से देना भी एक तरह से लोगों के अधिकार को कमजोर करता है।

समाधान में प्रशासन, उद्योग, किसान और आम नागरिक सभी की भूमिका है। साफ ईंधन, सार्वजनिक परिवहन, हरियाली और निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण जैसे उपायों को एक साथ लागू करना होगा। स्वच्छ हवा हर बच्चे का अधिकार है और इस अधिकार की रक्षा के लिए जवाबदेही तय होना ही सबसे पहला कदम है।