सरस मेला स्वयं सहायता समूहों से बदलती ग्रामीण महिलाओं की आजीविका

ग्रामीण भारत में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएँ अब केवल बचत तक सीमित नहीं हैं, वे उत्पादक और उद्यमी की भूमिका में सामने आ रही हैं। सरस मेले जैसे आयोजन इन महिलाओं को शहरी बाज़ार से जोड़ने का माध्यम बनते हैं, जहाँ उनके उत्पादों को पहचान और उचित दाम दोनों मिलते हैं।विजयवाड़ा में आयोजित मेले में 30 से अधिक राज्यों की 1500 से अधिक महिला उद्यमियों की भागीदारी इस बदलाव की झलक है। हस्तशिल्प, खाद्य प्रसंस्करण, बुनाई और पारंपरिक कला से जुड़े समूहों की आय में ऐसे मेलों के बाद वृद्धि देखी जाती है।आजीविका विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं की आय बढ़ने से परिवार में पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ता है। समूहों के माध्यम से ऋण, प्रशिक्षण और विपणन की सुविधा ने आत्मनिर्भरता को मज़बूती दी है।चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं — परिवहन लागत, पैकेजिंग और डिजिटल बिक्री की जानकारी जैसे विषयों में और सहयोग की ज़रूरत है। फिर भी, स्वयं सहायता समूहों का यह सफ़र ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का सशक्त प्रमाण है।