दिव्यांग नागरिकों के लिए सुगम सार्वजनिक स्थान अब अनिवार्य अधिकार

किसी भी सार्वजनिक भवन, अस्पताल, स्कूल या परिवहन साधन तक पहुँचना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन दिव्यांग नागरिकों के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। सीढ़ियों के सामने रैंप न होना, लिफ्ट का खराब होना, स्पर्शनीय रास्तों की कमी और सूचना का केवल एक ही रूप में होना, ये सभी बाधाएँ दिव्यांग व्यक्ति को समाज की मुख्यधारा से दूर कर देती हैं। सुगमता कोई दया नहीं, बल्कि समानता का अनिवार्य हिस्सा है।

कई बार भवन बनते समय रैंप बना तो दिया जाता है, लेकिन उसकी ढलान इतनी तेज होती है कि व्हीलचेयर से चढ़ना संभव नहीं होता। इसी तरह शौचालय तो बना दिया जाता है, लेकिन उसके दरवाजे की चौड़ाई कम होती है। ऐसी औपचारिक सुगमता से किसी का भला नहीं होता। असली सुगमता वही है जिसका उपयोग दिव्यांग व्यक्ति स्वतंत्र रूप से और बिना किसी की मदद के कर सके।

सूचना की सुगमता भी उतनी ही जरूरी है। दृष्टिबाधित व्यक्ति के लिए ब्रेल या ऑडियो सूचना, श्रवणबाधित व्यक्ति के लिए सांकेतिक भाषा या लिखित जानकारी और बौद्धिक दिव्यांगता वाले व्यक्ति के लिए सरल भाषा, ये सभी व्यवस्थाएँ सार्वजनिक सेवाओं का हिस्सा होनी चाहिए। जब जानकारी सब तक नहीं पहुँचती, तो अधिकार कागज पर ही रह जाते हैं।

आगे बढ़ने के लिए नए भवनों की स्वीकृति से पहले सुगमता की जाँच अनिवार्य हो, पुराने भवनों में चरणबद्ध सुधार हो और दिव्यांग नागरिकों को योजना बनाने में शामिल किया जाए। जो स्थान सबके लिए खुला है, वही वास्तव में सार्वजनिक कहलाने का हकदार है।