मासिक धर्म स्वच्छता मूल अधिकार, राज्यों को अदालत की चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि मासिक धर्म स्वच्छता (मेन्स्ट्रुअल हाइजीन) संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के मूल अधिकार का हिस्सा है, और इस पर अपने फैसले का पालन न करने वाले राज्यों के मुख्य सचिवों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई हो सकती है। न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने 13 अक्टूबर 2026 की सुनवाई में राज्यों की चुप्पी पर कड़ी नाराजगी जताई।
दरअसल, शीर्ष अदालत ने 30 जनवरी के अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि स्कूलों में छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी नैपकिन, बहता पानी वाले शौचालय, निपटान के लिए इंसिनरेटर और पाठ्यक्रम में मासिक धर्म स्वच्छता की जानकारी सुनिश्चित की जाए। लेकिन 1 सितंबर के आदेश के बावजूद अधिकतर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने केंद्र को अनुपालन रिपोर्ट नहीं भेजी।
पीठ ने कहा कि यदि फैसला सिर्फ कागज पर रहेगा तो दूर-दराज के इलाकों की किशोरियों का यह मूल अधिकार कैसे लागू होगा। अदालत ने केंद्र को हर राज्य से लिखित जानकारी मंगाने का निर्देश दिया और चेतावनी दी कि अगली सुनवाई 14 दिसंबर को होगी, जिसमें जवाब न देने वाले राज्यों के खिलाफ अवमानना नोटिस जारी किया जा सकता है।
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि मासिक धर्म स्वच्छता की कमी के कारण लाखों लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती हैं। यह फैसला उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और सम्मान से सीधे जुड़ा है। अब गेंद राज्यों के पाले में है।
