प्रवासी बच्चों की पढ़ाई के लिए पोर्टेबल कक्षा की अनूठी पहल
प्रवासी मजदूरों के बच्चों की पढ़ाई अक्सर उनके माता-पिता के बार-बार स्थान बदलने के कारण रुक जाती है। स्कूल में दाखिला, किताबें और नियमित कक्षाएं इन बच्चों के लिए बड़ी चुनौती बन जाती हैं। इसी समस्या का समाधान खोजने के लिए बेंगलुरु के एक किशोर ने प्रवासी बच्चों के लिए पोर्टेबल कक्षा तैयार करने की पहल की है, जिसकी चर्चा हो रही है।
पोर्टेबल कक्षा का विचार यह है कि पढ़ाई किसी एक इमारत तक सीमित न रहे। जहां बच्चे रहते हैं, वहीं हल्की और आसानी से लगाई जा सकने वाली कक्षा व्यवस्था की जा सके, ताकि उनका सीखना बीच में न रुके। इसमें बुनियादी पढ़ाई, भाषा और गणित के साथ-साथ खेल और रचनात्मक गतिविधियां भी शामिल हो सकती हैं। ऐसे प्रयासों से बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि बनी रहती है।
शिक्षा के अधिकार के जानकारों का कहना है कि प्रवासी बच्चों को शिक्षा से जोड़ना केवल स्कूलों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज और प्रशासन की साझा जिम्मेदारी है। यदि स्थानीय स्तर पर ऐसे छोटे-छोटे प्रयासों को समर्थन मिले, तो हजारों बच्चे पढ़ाई से बाहर होने से बच सकते हैं। पोर्टेबल कक्षा जैसी पहल इस दिशा में एक सकारात्मक सोच को दर्शाती है।
