पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों पर गोयल के आरोपों से बहस
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने विपक्ष के रवैये पर सवाल उठाते हुए पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों के कार्यकाल का हवाला दिया है। उनका कहना है कि जब विपक्ष के अनुकूल फैसले आते हैं तो संस्थाएं सही ठहरती हैं, लेकिन प्रतिकूल फैसलों पर उन्हीं संस्थाओं को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। इस बयान के बाद चुनाव आयोग की स्वायत्तता को लेकर चल रही बहस और तेज हो गई है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि देश के इतिहास में मुख्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और उनके फैसलों पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। कभी मतदाता सूची को लेकर तो कभी चुनाव कार्यक्रम पर राजनीतिक दल आपत्तियां दर्ज कराते रहे हैं। फिर भी आयोग ने अपनी संवैधानिक भूमिका निभाते हुए हर बार चुनाव प्रक्रिया पूरी कराई है।
विपक्ष का आरोप है कि वर्तमान दौर में संस्थाओं पर दबाव पहले से कहीं अधिक बढ़ा है। वहीं सत्ता पक्ष इसे चुनावी हार की निराशा बताता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बहस का समाधान पारदर्शिता और संवाद से ही निकलेगा, ताकि मतदाताओं का भरोसा लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बना रहे।
