गिग वर्कर्स: डिलीवरी कर्मियों के अधिकारों पर विशेष रिपोर्ट
ऑनलाइन खाना और सामान मंगाने की हमारी आदत के पीछे लाखों डिलीवरी कर्मियों की मेहनत है, लेकिन इन ‘गिग वर्कर्स’ के अधिकारों का सवाल अब गंभीर होता जा रहा है। लंबी ड्यूटी, कम भुगतान, सड़क दुर्घटनाओं का खतरा और सामाजिक सुरक्षा का अभाव — ये वे मुद्दे हैं जिनसे देश के करोड़ों गिग कर्मी रोज जूझते हैं।
डिलीवरी ऐप्स पर काम करने वाले अधिकांश कर्मी कंपनी के कर्मचारी नहीं माने जाते, बल्कि ‘स्वतंत्र भागीदार’ कहलाते हैं। इसका मतलब है कि उन्हें न्यूनतम वेतन, भविष्य निधि, स्वास्थ्य बीमा या सवेतन अवकाश जैसे लाभ नहीं मिलते। प्रति ऑर्डर मिलने वाली राशि में से ईंधन और वाहन रखरखाव का खर्च निकालने के बाद उनकी वास्तविक कमाई काफी कम रह जाती है। बारिश, धूप और ट्रैफिक में घंटों दौड़ने के बावजूद बीमारी या दुर्घटना की स्थिति में उनके पास कोई सुरक्षा कवच नहीं होता।
हाल के वर्षों में कई राज्यों ने गिग वर्कर्स के कल्याण के लिए बोर्ड और योजनाओं की घोषणा की है, लेकिन जमीनी स्तर पर लाभ पहुंचना अभी बाकी है। ई-श्रम पोर्टल पर असंगठित कामगारों का पंजीकरण बढ़ा है, जिससे उन्हें दुर्घटना बीमा जैसी सुविधाएं मिल सकती हैं। श्रमिक संगठनों की मांग है कि गिग कर्मियों को भी कर्मचारी का दर्जा देकर न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी दी जाए।
विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बने इन कर्मियों के बिना ऑनलाइन व्यापार ठप हो जाएगा। ऐसे में कंपनियों की जिम्मेदारी बनती है कि वे लाभ के साथ-साथ कर्मियों के कल्याण में भी निवेश करें। सरकार, कंपनियां और समाज — तीनों को मिलकर इन मेहनतकशों के लिए सम्मानजनक कार्य स्थितियां सुनिश्चित करनी होंगी।
